प्यार के दो तार से संसार बांधा है.

प्यार के दो तार से संसार बांधा है.

रक्षाबंधन भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख त्यौहार है। इस दिन बहनें अपनी रक्षा के लिए भाई की दाहिनी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है। भाई बदलें में सामथ्र्यं के अनुसार उपहार भेंट करता है। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चांदी जैसी मंहगी वस्तु तक की हो सकती है।

भारतीय परंपरा में विश्वास का बंधन ही मूल है और रक्षाबंधन इसी विश्वास का बंधन है। यह पर्व प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बांधने का भी वचन देता है। कहा जा सकता है रक्षाबंधन या राखी सिर्फ धागे से जुड़ा हुआ पर्व ही नहीं है बल्कि अपने आप में कई मायनों में बहुआयामी पर्व है। बहनों से हमारा तात्पर्य सिहमारी सहोदर बहनें ही नहीं हैं बल्कि वे सभी हमारी बहनें हैं जो हमारे इलाके में जन्मी हैं, हमारे आस-पास रहती हैं। अभिप्राय यह है कि बहनें जिस उच्चतम भावना प्रवाह के साथ हमारी कलाई पर राखी बांधती हैं उसका दसवां हिस्सा भी हममें वह जज्बा नहीं दिखता जो उनके लिए कुछ करने का होना चाहिए।


असल में हमने रक्षाबंधन को एक दिन का औपचारिक धागा बंधन पर्व ही मान लिया है और बस उसी दिन भाइयों और बहनों के संबंधों को निभाने की दुहाई दे डालते हैं। आज गैंगरेप, बलात्कार, अपहरण और बहनों के साथ जो अमानवीय हरकतें हो रही हैं, जिन घटनाओं ने समाज को शर्मसार कर रखा है, बहनों की इज्जत लूटी जा रही है और बहनें सुरक्षित नहीं हैं। यह सब इस बात को साफ -साफ परिलक्षित करता है कि हमारा रक्षाबंधन पर्व सिर्फ औपचारिक होकर रह गया है।

हम इस पर्व को अब निभाऊ रस्म से कुछ अधिक नहीं समझ पा रहे हैं और बहनों की रक्षा के लिए हमारी कलाइयों में बांधी गई राखी का कोई मान रखने में हम गंभीर नहीं हैं। हमें वर्तमान हालातों में सच्चे मन से यह स्वीकारने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए बहनों की रक्षा की बात तो दूर की है। आज जिन महिलाओं के साथ अशोभनीय और अमानवीय घटनाएं हो रही हैं, वे क्या हमारी अपनी बहनें नहीं हैं? सच तो यही है कि हमने उन्हें अपनी बहन माना ही नहीं। जो सहोदर बहन के लिए हमारे कपतव्य हैं वे उन सभी मां-बहनों और बेटियों के लिए भी हैं जो समाज में हैं। इन सभी की रक्षा का दायित्व हमारा अपना है।

देखा जाएं तो पहले रक्षा बंधन बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए किसी को भी रक्षा-सूत्र यानी राखी बांधी या भेजी जाती थी। सामान्यत: बहनें भाई को ही राखी बांधती हैं, लेकिन ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित संबंधियों को भी बांधी जाती है। यानी कुटुम्ब से लेकर राष्ट्र रक्षा तक के दायित्वों को समर्पित होकर निभाने के संकल्पों को दृढ़ करने का पर्व है रक्षाबंधन। जब समाज और राष्ट्र सुरक्षित होगा तभी हमारी बहन-बेटियों की इज्जत सुरक्षित रह पाएगी।

रक्षाबंधन का यह दिन हमें यही संदेश देने हर साल आता है कि हम बहनों से लेकर सीमाओं तक की रक्षा करने में पीछे नहीं रहें। कृष्ण ने गीता में कहा है- सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव। यानी अविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र यानी धागा बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है।

माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र (राखी) भी लोगों को जोड़ता है। कहते हैं कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में कमी आने लगती है, तब ज्योर्तिलिंगम् भगवान शिव प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगलकामना करते हुए भाइयों को बांधती हैं और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से निजात दिलाते हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब देश संकट में आया, हमारी माता-बहनों और बेटियों की इज्जत बेरहमी से लूटी गई और हम सारे कलंकित हुए। पिछली सदियों के अभिशापों भरी घोर गुलामी के अनुभवों से भी हम सीख नहीं ले पा रहे हैं, यह हमारा शर्मनाक और घृणित दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

श्रावण मास की पूर्णिमा का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि इस दिन पाप पर पुण्य, कुकर्म पर सत्कर्म और कष्टों के उपर सज्जनों का विजय हासिल करने के प्रयासों का आरंभ हो जाता है। जो व्यक्ति अपने शत्रुओं या प्रतियोगियों को परास्त करना चाहता है,उसे इस दिन वरूण देव की पूजा करनी चाहिए। दक्षिण भारत में इस दिन न केवल हिन्दू वरन् मुसलमान, सिक्ख और ईसाई सभी समुद्र तट पर नारियल और पुष्प चढ़ाना शुभ समझा जाता है।

नारियल को भगवान शिव का रुप माना गया है, नारियल में तीन आंखे होती है। तथा भगवान शिव की भी तीन आंखे है। आज हमारी बहनें सुरक्षित नहीं है, उनकी रक्षा का संकल्प लेना होगा। तभी हमारे संस्कृति व समाज की रक्षा हो सकेगी। रक्षा बंधन हमें आजादी का सीख देता है कि हम स्वयं को इस योग्य बना सके कि बहनों की रक्षा कर सकें। इस त्योहार के पीछे सिर्फ बहन ही नही समाज, देश, पर्यावरण सभी की रक्षा का संदेश देता है। हमारे यहां कन्यादान भी महायज्ञ रहा और कन्या लक्ष्मी का, दामाद विष्णु का एवं नाती, विष्णु का अंश (ब्राह्मण के रूप में) मान्य रहे। कितने ब्राह्मणों के यहां आज भी नाती भांजे पुरोहित होते हैं। रक्षाबंधन के दिन नाती भांजा नहीं पाया हो और बहन ने ही अपने पुत्र का कार्य कर दिया हो और उस घर की परंपरा बन गई हो, फिर समाज ने इसे मान्यता दे दी हो। यही विकास शुरुआती कदम नई परंपरा का जनक हो सकता है।

इस दिन प्रात: स्नानादि से निवृत्त होकर लड़कियां और महिलाएं पूजा की थाली सजाती हैं। थाली में राखी के साथ रोली या हल्दी, चावल, दीपक और मिठाई होते हैं। लड़के और पुरुष स्नानादि कर पूजा या किसी उपयुक्त स्थान पर बैठते हैं। उन्हें रोली या हल्दी से टीका कर चावल को टीके पर लगाया जाता है और सिर पर छिड़का जाता है, उनकी आरती उतारी जाती है और तब दाहिनी कलाई पर राखी बांधी जाती है। भाई बहन को उपहार या धन देता है। इसका सामाजिक महत्व तो है ही, धर्म, पुराण, इतिहास, साहित्य और फिल्में भी इससे अछूते नहीं हैं।
इंद्राणी ने बांधी थी अपने पति को राखी

राखी का त्योहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता। लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नजर आने लगे। भगवान इंद्र्र घबरा कर बृहस्पति के पास गए। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था।

राजा बलि से जुड़ी कथा

स्कंध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्ïभगवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है। दानवेंद्र राजा बलि का अहंकार चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और ब्राह्मण के वेश में राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। भगवान ने बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि की मांग की। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नाप लिया और राजा बलि को रसातल में भेज दिया। बलि ने अपनी भक्ति के बल पर भगवान से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान को वापस लाने के लिए नारद ने लक्ष्मी जी को एक उपाय बताया। लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बांध अपना भाई बनाया और पति को अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी।

महाभारत में भी रक्षाबंधन

रक्षाबंधन की कथा महाभारत से भी जुड़ती है। जब युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं। तब भगवान कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था, तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्र्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी थी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया था।

राखी से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग

इस त्योहार से कई ऐतिहासिक प्रसंग जुड़े हैं। राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ-साथ हाथ में रेशमी धागा बांधती थी। यह विश्वास था कि यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ वापस ले आएगा। एक अन्य प्रसंग में कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पोरस को राखी बांधकर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन ले लिया। पोरस ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान किया और सिकंदर पर प्राण घातक प्रहार नहीं किया।

कर्मवती ने हुमायूं को बांधी थी राखी

चित्तौड़ की राजमाता कर्मवती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर अपना भाई बनाया था और वह भी संकट के वक्त बहन कर्मवती की रक्षा के लिए चितौड़ आ पहुंचा था। कहते है मेवाड़ की रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर आक्रमण करने की सूचना मिली। रानी उस समय लडऩे में असमर्थ थी अत: उन्होंने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा की याचना की। हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंच कर बहादुरशाह के विरुद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ाई लड़ी।

यमुना ने यमराज को बांधी राखी
मान्यता है कि एक बार यमुना ने अपने भाई और यमलोक के राजा यम को राखी बांधी। कहा जाता है कि यमराज को अमरत्व इसी वजह से प्राप्त था क्योंकि यमुना उन्हें राखी बांधती थी। रक्षा बंधन का वह समय इतना पवित्र था कि उससे प्रभावित होकर यमराज ने यह घोषणा की थी की आज के बाद कोई भी बहन जब भी अपने भाई को राखी बांधेगी और वह उसकी रक्षा का वचन देगा तो उसे अमरत्व प्राप्त हो जाएगा।

शूपर्णखा ने भी बांधी राखी

त्रेता युग में रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा नाक कटने के पश्चात रावण के पास पहुंची और रक्त से सनी साड़ी का एक छोर फाड़कर रावण की कलाई में बांध दिया और कहा कि भैया! जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे, तुम्हें अपनी बहन का अपमान याद आएगा और मेरी नाक काटने बवालों से तुम बदला ले सकोगे।

मंत्रोचार

भाई की कलाई पर राखी बांधते समय बहन को इस मंत्र का उच्चारण जरूर करना चाहिए- येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्र्रो महाबला।
तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल।।
मुंहबोली बहने भी बांध सकती हैं राखी

उन भाइयों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जिनकी अपनी सगी बहन नहीं है, क्योंकि मुँहबोली बहनों से राखी बंधवाने की परंपरा भी काफी पुरानी है। भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो लेकिन उसी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है।

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