सुषमा स्वराज ने इसलिए बेटी का नाम रखा था ‘बांसुरी’, बेहद रोचक है पूरी कहानी

सुषमा स्वराज ने इसलिए बेटी का नाम रखा था ‘बांसुरी’, बेहद रोचक है पूरी कहानी

देश ने अपनी शक्तिशाली संतरी और प्यारी बेटी को खो दिया है। 67 वर्ष की आयु में, पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, जो दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री और सबसे कम उम्र की मंत्री बनीं, ने मंगलवार को दिल्ली के एम्स में अंतिम सांस ली। उनका जाना न केवल बीजेपी बल्कि पूरे देश के लिए बहुत बड़ी क्षति है। आज आपने उसके बारे में कई बातें सुनी होंगी लेकिन आपको पता नहीं होगा कि उसका अपनी बेटी के साथ बहुत गहरा रिश्ता था। इसी कारण आज उनकी इकलौती बेटी ने उनका अंतिम संस्कार किया। उनकी बेटी का नाम एक बांसुरी है, जिसके पीछे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है। जानिए क्या है वो…

सुषमा स्वराज भगवान कृष्ण की बहुत बड़ी भक्त थीं। उनकी भगवान कृष्ण पर अपार श्रद्धा थी। वह उनके जीवन से इतनी प्रभावित थीं कि कहा जाता है कि वह भगवान की तरह की कई रूपों में अपनी भूमिका निभाना चाहती थीं। इसे आसान शब्दों में समझें तो उन्होंने एक मां, एक बेटी, एक पत्नी, एक राजनीतिज्ञ के रूप में जिंदगी को भरपूर जिया। उनके जीवन में उनकी बेटी बहुत खास स्थान रखती थीं और इसीलिए उसका नामकरण भी उन्होंने सोच समझकर किया।जिस तरह भगवान कृष्ण को उनकी बांसुरी बहुत प्रिय थी सुषमा जी को बेटी भी बहुत प्रिय थी। यही वजह है कि उन्होंने बेटी का नाम ‘बांसुरी’ रख दिया।


बांसुरी ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक किया है और इनर टेम्पल से कानून की डिग्री प्राप्त की है। अपने पिता की तरह, वह भी आपराधिक मामलों की वकील हैं और दिल्ली उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता हैं।

बेटी की बांसुरी के अलावा, ऐसे कई पहलू हैं जो सुषमा के जीवन में बहुत खास रहे हैं। उन्होंने अपने हर प्यार के साथ एक अलग रिश्ता बनाए रखा।

साल 2009 में सुषमा विदिशा लोकसभा से सांसद चुना गई थीं। सांसद रहते हुए उन्होंने एक पुस्तकालय बनवाया था। उन्हें अपने लोगों से इतना प्यार था कि लाइब्रेरी में विदिशा के लोगों के लिए एक विशेष सुविधा रखवाई गई थी। सुषमा स्वराज ने अपनी लाइब्रेरी में बड़े अक्षरों में लिखवा रखा था कि, ‘विदिशा के लोग इस लाइब्रेरी से अपने पसंद की कोई भी एक पुस्तक लेकर जा सकते हैं’

किताबें पढ़ने के अलावा सुषमा स्वराज को संगीत सुनना भी पसंद था, लेकिन वो खाली समय में फिल्मी गानों के बजाय शिव तांडव सुनना पसंद करती थीं।

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