मध्य प्रदेश: बच्चों के पोषण के लिए अंडा खिलाने की नीति पर भाजपा राजनी​ति क्यों कर रही है?

मध्य प्रदेश: बच्चों के पोषण के लिए अंडा खिलाने की नीति पर भाजपा राजनी​ति क्यों कर रही है?

मध्य प्रदेश के लिए कुपोषण एक ऐसा नासूर है, जिसे जितना कुरेदो दर्द उतना ही बढ़ता है. गाहे-बगाहे बहस में आने वाला यह मुद्दा पिछले एक हफ्ते में एक बार फिर चर्चा का विषय बना, क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार ने कुपोषण के संकट से निपटने के लिए समेकित बाल विकास सेवाओं के तहत पोषण आहार कार्यक्रम में बच्चों को ‘अंडे’ उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू की है.

यह उल्लेख करना जरूरी है कि वर्ष 2001 से लगातार मध्य प्रदेश बच्चों में कुपोषण और सबसे ऊंची बाल मृत्यु दर के कारण भी पहचाना जाता रहा है.


प्रस्ताव किया गया है कि मध्य प्रदेश सरकार राज्य के 89 आदिवासी बहुल विकास खंडों में आंगनबाड़ियों के जरिये उन बच्चों को अंडे प्रदान करेगी, जिन्हें अंडे के सेवन से कोई सांस्कृतिक या धार्मिक गुरेज़ नहीं है.

इस प्रस्ताव की सूचना सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने यह घोषणा कर दी कि वह इस निर्णय का विरोध करेगी और इसे लागू नहीं होने देगी.

नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता गोपाल भार्गव ने बच्चों को अंडे दिए जाने के परिणामों की व्याख्या करते हुए कहा कि अंडे के बाद राज्य सरकार बच्चों को मुर्गे और बकरे का मांस परोसेगी. एक दिन उन्हें नरभक्षी बना दिया जाएगा. मांसाहार धार्मिक परंपराओं के खिलाफ है, इससे बच्चों में तामसिक प्रवत्ति बढ़ेगी.

भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि प्रोटीन देना ही है, तो दूध, दलिया या खीर भी दे सकते हैं.

दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों से समाज के 26 हजार आम लोगों ने भोजन का अधिकार अभियान के तहत अंडे की मांग का पत्र स्थानीय कलेक्टरों के माध्यम से मध्य प्रदेश को भेजा है. एक तरह से समाज और मध्य प्रदेश सरकार अब तक एक-दूसरे से सहमत नज़र आ रहे हैं.

हमें तथ्यों के आधार पर अंडे की जरूरत और नीति को समझना होगा. मध्य प्रदेश में कुल 42 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन से प्रभावित हैं. यह स्तर जैन समुदाय में 17 प्रतिशत है और आदिवासी समुदाय में लगभग तीन गुना ज्यादा यानी 48.2 प्रतिशत है.

इसी तरह गंभीर ठिगनापन जैन समुदाय में केवल 2.2 प्रतिशत है, वहीं कई आदिवासी समुदाय में लगभग 11 गुना ज्यादा यानी 23.5 प्रतिशत है. जब अति गंभीर कुपोषण (जिसमें बच्चों की मृत्यु की आशंका 5 से 20 गुना तक ज्यादा होती है) भी आदिवासी समुदाय के बच्चों में ज्यादा है.

जहां तक अध्ययन बताते हैं आदिवासियों और अनुसूचित जाति के ज्यादातर परिवारों में अंडे के उपभोग को लेकर कोई रुकावट नहीं है; और जरूरत भी उनके लिए ही है. ऐसे में सवाल उठा रहा है कि यह निर्णय किसके लिए बेहतर है और कौन इसका विरोध कर रहा है?

एक बड़ा सवाल यह भी उठा रहा है कि भारत में आदिवासी समुदाय की सबसे ज्यादा जनसंख्या मध्य प्रदेश में है, किन्तु फिर भी इन दस वर्षों में आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधियों, विधायकों और सांसदों ने बच्चों में कुपोषण के बड़े सवाल पर चुप्पी साधे रखी. आखिर क्यों?

यह भी एक तथ्य तो है ही कि मध्य प्रदेश में ऊंची जाति और प्रभावशाली समुदायों की राजनीति ने कभी भी आदिवासी नेतृत्व को निर्णायक भूमिका में आने ही नहीं दिया. तथ्य तो यह भी है कि आदिवासी विधायकों को आदिवासी मंत्रणा परिषद में ही अपनी भूमिका निभाने का अधिकार नहीं मिल पाया है.

बहरहाल सवाल यह भी हैं कि मध्य प्रदेश में वर्ष 2009-10 से 2016-17 तक आंगनबाड़ी के पोषण आहार (टेक होम राशन) के उत्पादन और व्यवस्था में गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं.

यह माना गया कि नौ सालों में पोषण आहार माफियाओं ने बच्चों के कुपोषण के दर्द की उपेक्षा करते हुए लगभग 4000 करोड़ रुपये का मुनाफ़ा कमाया.

उच्च न्यायालय ने भी इस पर कठोर टिप्पणी की और व्यवस्था बदलने के निर्देश दिए; तब अंडे की खिलाफत करने वाले समाज और शाकाहारी समुदायों ने बच्चों के अधिकारों के हनन और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला.

इससे यह साफ़ नज़र आता है कि वास्तव में अंडे के विरोध के माध्यम से सत्ता-सम्पन्नता की सियासत की जा रही है.

मध्य प्रदेश में इस विषय की पृष्ठभूमि यह है कि वर्ष 2009 और वर्ष 2015 में भी कुपोषण की समस्या और पोषण आहार कार्यक्रम में प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए अंडे के वितरण के प्रस्ताव विभाग प्रस्तुत कर चुका है.

उन दोनों ही अवसरों पर मध्य प्रदेश के मंत्रिमंडल ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व में न केवल उन प्रस्तावों को खारिज कर दिया था, बल्कि यह भी स्पष्ट किया था कि ये विकल्प मध्य प्रदेश की शाकाहार संस्कृति के विरुद्ध है.

तब राज्य के महिला एवं विकास विभाग ने चर्चा के लिए प्रस्ताव रखा था कि तीन जिलों- अलीराजपुर, मंडला और होशंगाबाद में एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम (आईसीडीएस) के तहत बच्चों को हफ्ते में 2 से 3 दिन अंडे खिलाए जाएं.

प्रस्ताव के शुरुआती दौर में ही राज्य के जैन संगठनों ने विरोध करना शुरू कर दिया था. प्रभावशाली समुदाय के जरिये मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रेरित किया गया कि वे इसका विरोध करें. इन दोनों ही अवसरों पर प्रभावशाली हिंदू और जैन नेताओं ने इस विकल्प को लागू नहीं होने दिया था.

आखिरकार फैसला यही हुआ था कि आंगनबाड़ी में बच्चों को अंडा नहीं मिलेगा. तब मीडिया रिपोर्ट कहती थी कि कट्टर शाकाहारी मुख्यमंत्री ने बच्चों को अंडा खिलाने के प्रस्ताव को खारिज किया. इन खबरों से ऐसा लगता था कि शासन व्यवस्था पूरी तरह से व्यक्ति केंद्रित हो चुकी है.

अव्वल तो यह निर्णय राज्य सरकार और शासन व्यवस्था के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े करता रहा है, साथ ही यह संकेत भी देता है कि कुपोषण को लेकर सामाजिक ही नहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी पूरी तरह से अभाव है.

दाल-चावल, सब्जी, रोटी, खीर-मक्खन, सोया-पनीर कुछ भी हो, कुपोषण से निपटने के लिए अच्छे ही हैं. उसी कड़ी में अंडा भी ज्यादा पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है.

यदि आप सम्मान के साथ बिना भ्रष्ट आचरण के ये सब खिला सकें तो कुपोषण तो कम हो ही जाएगा. इसमें कोई शक नहीं है.

शक तो मंशा पर है कि क्या वास्तव में हम कुपोषण के पहाड़ को चढ़ने की मंशा रखते भी हैं. दाल कम पानी ज्यादा, पोषण आहार के पैकेट में बदबू, कभी मिले-कभी न मिले; कोई भरोसा नहीं; जो खिलाने की नीति बनाई उस पर अनैतिक क्रियान्वयन हावी हो गया. ऐसे में ही सरकार का कहना कि भले अच्छा हो, पर अंडे का विकल्प लागू न होगा. यह एक विकल्प है, अनिवार्यता नहीं.

दूध या अंडा

बात केवल अंडे तक सीमित नहीं है; न ही यह अंतिम विकल्प है. बात बेहतर पोषण, सहज उपलब्धता की है.

बाल पोषण अधिकार की विशेषज्ञ डॉ. दीपा सिन्हा कहती हैं, ‘भोजन में विविधता महत्वपूर्ण है. यदि बच्चों को दूध, दाल, फल, सब्जी, अनाज, तेल मिल पाएं, तो भी सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत पूरी हो सकती है. लेकिन एनएसएसओ और नेशनल न्यूट्रीशन मॉनीटरिंग ब्यूरो के अध्ययन बताते हैं कि ज्यादातर आबादी को विविधतापूर्ण भोजन नहीं मिल पाता. इस सूरत में बच्चों के लिए अंडा एक अनिवार्यता बन जाती है, क्योंकि प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का दूसरा कोई बेहतर विकल्प भी नहीं.’

भारत में अक्टूबर 2014 की पौष्टिक अंतर्ग्रहण रिपोर्ट (एनएसएसओ) कहती है कि मध्य प्रदेश में लोगों को 70.7 प्रतिशत प्रोटीन अनाज से मिलता है. बाकी का 10.8 प्रतिशत प्रोटीन दाल और 9 प्रतिशत दूध से मिलता है.

अनाज से मिलने वाला प्रोटीन अच्छी गुणवत्ता का नहीं माना जाता. प्रोटीन का अच्छा स्रोत दूध है, लेकिन ऊंची कीमत और शुद्धता के अभाव ने उसे समाज से दूर किया है.

मध्य प्रदेश में 5 साल से छोटे बच्चों के दूध पर औसतन 54 रुपये मासिक (1.80 रुपये प्रतिदिन) खर्च होता है. अब मध्य प्रदेश सरकार भरोसा दिला रही है कि आंगनबाड़ी में बच्चों को सप्ताह में 2 से 3 दिन दूध मिलेगा.

कम्युनिटी पीडियाट्रिशियन और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पूर्व सदस्य डॉ. वंदना प्रसाद कहती हैं, ‘अंडा केवल पोषण के लिहाज से ही नहीं, बल्कि किफायती और सुरक्षित भी है. इसे आसानी से पकाया जा सकता है और यह समुदाय में पोल्ट्री उद्योग को बढ़ावा देने में कारगर होगा. वैसे भी बच्चों को जो विविधताभरा भोजन चाहिए, वह संपन्न परिवारों को ही नसीब होता है.’

राज्य के नेता कह रहे हैं कि बच्चों को दूध, दलिया और खीर दी जाए, किन्तु, समस्या यह है कि उन्हें यह जानकारी नहीं है कि मध्य प्रदेश इस वक्त रासायनिक दूध का गढ़ बना हुआ है. भयंकर मिलावट है और इसमें यूरिया मिलाया जा रहा है.

पूर्व में भी अंडे को लेकर जारी बहस के बीच राज्य खाद्य पदार्थ परीक्षण प्रयोगशाला की रिपोर्ट में सामने आया कि 2014-15 में दूध के 983 नमूनों की जांच में 282 यानी 29 प्रतिशत मिलावटी निकले.

सीधी जिले में तो 100 फीसदी दूध मिलावटी निकला. जब 88 लाख बच्चों को नियमित रूप से दूध देने की बात हो रही है तो इस पक्ष को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है?

यह भी देखें कि आंगनबाड़ी में तीन दिन दूध देने के लिए महीने भर में 21.12 लाख लीटर दूध जरूरी होगा.

इसके बाद मध्य प्रदेश में वर्ष 2015-16 में राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश दुग्ध संघ से दूध पाउडर लेकर बच्चों में वितरित करना शुरू किया. यह दूध पाउडर अलग-अलग स्वादों में था और इसे पानी में घोलकर बच्चों को पिलाने की योजना बनाई गई.

माना जाता है कि इस योजना पर सालाना 250 से 300 करोड़ रुपये खर्च हुए, किन्तु बच्चों और समुदाय दोनों ने इसकी गुणवत्ता और स्वाद के कारण इसे स्वीकार नहीं किया. यह पहल निष्फल रही.

पन्ना में कार्यरत सामाजिक संस्था पृथ्वी ट्रस्ट के संयोजक यूसुफ बेग कहते हैं, ‘आंगनबाड़ी कार्यक्रम में अंडे का प्रावधान होने से बच्चों को सुरक्षित और बिना मिलावट का प्रोटीन हासिल होगा, इससे स्थानीय स्तर पर मुर्गी पालन को भी प्रोत्साहन मिलेगा. हम पन्ना जिले में अपने कार्यक्रम के तहत बच्चों को दो बाल विकास केंद्रों के जरिये तीन साल से अंडे का वितरण करते रहे हैं. इसे समाज ने स्वीकार भी किया और इससे उन गांवों में कुपोषण की स्थिति में भी कमी आई.’

अध्ययनकर्ता और इंडियन इंस्टिट्यूट आफ मैनेजमेंट (अहमदाबाद) पढ़ाने वाली एसोसिएट प्रोफेसर रीतिका खेरा मानती हैं, ‘अंडे बच्चों और लड़कियों के लिए पशु उत्पादित प्रोटीन का श्रेष्ठ स्रोत है. इसमें विटामिन-सी के अलावा हर पोषक तत्व मौजूद है. देश के 15 राज्यों में आंगनबाड़ी और मध्याह्न भोजन में बच्चों को अंडा मिल रहा है. कुछ राज्यों में अगड़ी जातियों ने अंडे की राह में रोड़े अटकाए, लेकिन शाकाहारी परिवारों के लिए इसकी जगह दूध और केले दिए जा सकते हैं. यह एक पक्षीय निर्णय नहीं हो सकता.’

राष्ट्रीय पोषण संस्थान (हैदराबाद) ने भी अंडे को प्रोटीन का बेहतर स्रोत माना है. संस्थान ने वंचित तबकों, खासतौर पर बच्चों और महिलाओं के लिए इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने की सिफारिश की है.

अंडे में लगभग सभी अमीनो एसिड्स पाए जाते हैं. अगर एक किलोग्राम वजन के बच्चे को अंडा मिले तो उसे रोजाना 1.2 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होगी. इसके बजाय उसे यदि सब्जी और अनाज खिलाएं तो दो ग्राम प्रोटीन की जरूरत होगी.

शाकाहारी समाज होने का भ्रम

यह जानना बेहद दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश में अंडे पर नीतिगत निर्णय जैन समाज के किसी कार्यक्रम के मंच पर ही होता है. ऐसे ही एक मंच से 2009-10 में अंडे की खिलाफत की जमीन तैयार की गई थी. इस साल फिर यही हुआ.

शाकाहारी परिवार के बच्चे पर अंडा खाने की बाध्यता बेशक नहीं होनी चाहिए. उन्हें दूध-केले का विकल्प दिया जा सकता है. लेकिन इस मुद्दे पर चर्चा नहीं हो रही. बस फैसला सुना दिया जाता है.

राज्य में आधे बच्चों और गर्भवती-धात्री महिलाओं को टेक होम राशन दिया जाता है, यदि चाहना हो तो अंडे के लिए अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है.

शिवपुरी जिले में सहरिया आदिवासियों के बीच काम कर रहे अजय यादव कहते हैं, ‘पोहरी ब्लॉक में 24 तरह के पैकेट बंद आहार गांव की छोटी-छोटी दुकानों में मिल रहे हैं. उन पर पहले पाबंदी लगानी चाहिए थी. अंडा तो इनसे कहीं ज्यादा जरूरी है. हमने पिछले दो सालों में 900 सहरिया परिवारों में मुर्गीपालन शुरू करवाया है, जिससे न केवल बच्चों में कुपोषण कम हुआ है, बल्कि महिलाओं के पोषण स्तर में भी सुधार हुआ है.’

‘द हिंदू’ और ‘सीएनएन-आईबीएन’ के वर्ष 2006 में किए गए अध्ययन से पता चला कि मध्य प्रदेश की 35 प्रतिशत जनसंख्या शाकाहारी है. जनगणना 2011 के मुताबिक, भारत में सबसे ज्यादा आदिवासी (1.52 करोड़) मध्य प्रदेश में रहते हैं. इनमें से 90 प्रतिशत शाकाहारी नहीं हैं. लेकिन इनमें कुपोषण इस कदर है कि 28.27 लाख बच्चों में से 71.4 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं.

दलित बच्चों में 17.59 लाख में से 62.6 प्रतिशत कम वजन के हैं. फिर भी सरकार इन तबकों से कभी नहीं पूछती कि उन्हें अंडे से परहेज तो नहीं? जिस मंच पर ‘अंडा रहित पोषण’ का निर्णय लिया गया, वह सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे संपन्न तबकों का है. पोषण आहार कार्यक्रम का लाभ लेना उनकी प्राथमिकता में नहीं है.

इसके बाद सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के बेसलाइन सर्वे (2014) से पता चला कि भारत में 71.6 प्रतिशत पुरुष और 70.7 प्रतिशत महिलाएं शाकाहारी नहीं हैं. मध्य प्रदेश में भी 51.1 प्रतिशत पुरुष और 47.7 प्रतिशत महिलाएं मांसाहारी हैं. इससे राजनेताओं का यह तर्क बेमानी हो जाता है कि आंगनबाड़ी में अंडे प्रदान किए जाने से भारत की सांस्कृतिक-धार्मिक अस्मिता नष्ट हो जाएगी.

नीति नहीं राजनीति

मध्य प्रदेश में वर्ष 2008-09 में 67.15 करोड़ अंडों का उत्पादन हुआ, जो 2017-18 में बढ़कर 194.22 करोड़ हो गया. मछली पालन को लेकर मध्य प्रदेश सरकार की नीति कहती है, ‘बढ़ती आबादी, बेरोजगारी तथा पौष्टिक आहार में कमी की सूरत में मत्स्य पालन रोजगार के साथ प्रोटीन युक्त किफायती भोजन भी देता है.’

इसका मतलब है कि अंडे पर रोक सरकारी नीति नहीं, बल्कि एक खास संदर्भ और परिस्थिति में लिया गया निर्णय है. सितंबर 2007 में मध्य प्रदेश सरकार ने गंभीर कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए प्रोजेक्ट शक्तिमान शुरू किया था. इसमें एक साल के लिए 19 जिलों के 38 विकास-खंडों के 1000 गांवों में बच्चों को उबले अंडे और उबले आलू खिलाए गए.

कुपोषण-ग्रस्त 10 हजार बच्चों का इलाज हुआ. सरकार का दबाव अंडे की जरूरत पर भारी पड़ता दिख रहा है. मार्च से अगस्त 2010 के बीच इंदौर के गांवों में पंचायतों की पहल पर 4123 गंभीर कुपोषित बच्चों को अंडे खिलाए गए. इससे 3077 बच्चों का वजन बढ़ा, 1452 बच्चे गंभीर से मध्यम श्रेणी में आ गए और 310 बच्चे सामान्य हो गए.

इसके बावजूद 2010 में अटल बाल स्वास्थ्य और पोषण मिशन की स्थापना से ही अंडा देने का प्रावधान हटा लिया गया, क्योंकि राज्य के तीन तत्कालीन मंत्रियों- गोपाल भार्गव, अर्चना चिटनिस और जयंत मलैया को इस पर आपत्ति थी.

अंडे का विरोध समाज ने नहीं किया. राज्य सरकार ने ही इसे रोकने की पहल की थी.

जरा नजर उठाकर देखिए; समाज का एक हिस्सा कभी भी दूसरे हिस्से के खान-पान को रोकते हुए नजर न आएगा; फिर रोक की पहल कौन कर रहा है; जरा सोचिये!

इसके बाद भी कुपोषण प्रबंधन कार्यक्रमों की नीति बनाते समय अंडे के विकल्प की बात कही गई, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया. एक जून 2015 को जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में राज्य की तत्कालीन पशुपालन मंत्री कुसुम महदेले ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में कहा था कि मछली या मांस खाने वालों को अंडा देने में कुछ गलत नहीं है.

असल में वे राज्य को मछलीमय और कछुआमय बनाने की बात कह रही थीं. मध्य प्रदेश में 3 से 6 साल के बच्चों को स्वयं सहायता समूहों से गरम और पका हुआ पोषण आहार मिलता है. एक बच्चे के लिए 4 रुपये का बजट बहुत कम है. इस पर भी स्वयं सहायता समूहों से बिल पास करवाने के नाम पर रिश्वत मांगी जाती है.

दूसरी तरफ टेक होम राशन की व्यवस्था में भी गुणवत्ता और मात्रा को लेकर सवाल उठते रहे हैं. टेक होम राशन में मिल रही खिचड़ी में नमक, हल्दी और तेल मिला होने से स्वाद में बदलाव और अजीब तरह की बू की शिकायत के चलते बच्चे, महिलाएं उसे नहीं खा पाते.

प्रोफेसर ज्यां द्रेज भी कहते हैं, ‘पोषण आहार के लिए अंडा बेहतर विकल्प है.’

राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद की पूर्व उप-निदेशक वीणा शत्रुघ्न कहती हैं, ‘प्रोटीन का मापन उसके जैविक मूल्य के आधार पर होता है. दालों और अनाज का जैविक मूल्य 60 और 70 के बीच है, जबकि अंडे में प्रोटीन का जैविक मूल्य 100 है. अंडे में अमीनो एसिड्स होने के कारण शरीर इसे 100 फीसदी सोख लेता है. इसे सरल शब्दों में समझें तो शाकाहारी भोजन से प्राप्त प्रोटीन का जैविक मूल्य पशु उत्पादों से कम होता है.’

वस्तुतः जब यह स्पष्ट है कि पोषण आहार का एक खास स्रोत किसके लिए (समाज के उस तबके के लिए जो सामाजिक आर्थिक रूप से हाशिये पर धकेला गया है और जहां अंडा त्याज्य नहीं है) जरूरी खाद्य पदार्थ है.

उस विषय पर सांस्कृतिक सवाल कौन (सामाजिक और आर्थिक रूप से ऊंचे मुकाम पर बैठा समुदाय, जिसने कुपोषण का दंश ही न झेला हो) उठा रहा है!

इस व्यवस्था में प्रभावशाली समुदायों द्वारा उठाई गई सांस्कृतिक आपत्तियों पर समावेशी शासन-व्यवस्था के तहत समाज से कोई चर्चा किए बिना सरकार तत्काल निर्णय ले लेती है कि सभी बच्चों को (जिनमें आदिवासी और दलित समुदाय के बच्चे सबसे ज्यादा है) अंडे के विकल्प से वंचित किया जाता है.

यह विषय केवल आंगनबाड़ी, कुपोषण और अंडे तक ही सीमित नहीं है, यह अनुभव हमें राज्य और समाज के मौजूदा वर्ग चरित्र का दर्शन भी करवाता है.

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