पिंक बॉल टेस्ट मैच से जुड़े अपने कंफ्यूजन से दूर!

पिंक बॉल टेस्ट मैच से जुड़े अपने कंफ्यूजन से दूर!

क्रिकेट की दुनिया में आने वाले दिनों में पिंक बॉल  की एंट्री होने वाली है। इसी महीने के अंत में कोलकाता में होने वाले डे-नाइट टेस्ट मैच (डे नाइट टेस्ट मैच) के दौरान पिंक बॉल से मैच खेला जाना है। 22 नवंबर से कोलकाता के ईडन गार्डन्स में भारत और बांग्लादेश (भारत बनाम बांग्लादेश टेस्ट मैच) के बीच होने वाले दूसरे टेस्ट मैच में पहली बार गुलाबी लीग का इस्तेमाल होगा। अभी गुलाबी गेंद मैदान पर उतरी भी नहीं है और उसे तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं। कुछ लोग बता रहे हैं कि यह अच्छी तरह से होगा, तो कुछ का मानना ​​है कि इससे नुकसान होगा। यहाँ तक कि खिलाड़ी भी ऐसे अलग-अलग राय रखते हैं। चेतेश्वर पुजारा कहते हैं कि वह दिलीप ट्रॉफी में गुलाबी गेंद से खेल चुके हैं और घरेलू स्तर पर गुलाबी गेंद सस्ते हो सकती हैं। वहीं दूसरी ओर वह यह भी मान रहे हैं कि सूरज ढलने के समय कठिनाई हो सकती है। दरअसल, अभी तक लाल और सफेद गेंद से खेला जाता था, लेकिन गुलाबी गेंदबाज ने कई तरह के सवाल पैदा कर दिए हैं। आइए देते हैं आपके सवालों के जवाब।

गुलाबी गेंद की बातें जब से शुरू हुई हैं, कई तरह के कंफ्यूजन भी पैदा हो गए हैं।


गुलाबी ही क्यों?

एक सामान्य सा सवाल है जो बहुत से लोगों के मन में उठ रहा है कि आखिर गुलाबी गेंद ही क्यों? कोई और रंग की गेंद क्यों नहीं? हरि, पीली, नीली, काली … सिर्फ गुलाबी गेंद ही क्यों? दरअसल, गुलाबी गेंद लाल गेंदबाज और सफेद गेंद के बीच की है। यानी इसमें टेस्ट मैच खेली जाने वाली लाल गेंदबाज और वन डे मैच खेली जाने वाली सफेद मैच दोनों का अंश होगा। कहना गलत नहीं होगा कि यह दोनों से मिलकर बना हुआ है। टेस्ट मैच में सफेद ड्रेस के सामने सफेद गेंद ठीक से नहीं दिखती, इसलिए लाल गेंद से खेलते हैं, जबकि वन डे मैच में रंगीन जर्सी होती है, इसलिए सफेद गेंद से खेलते हैं। ऐसे में गुलाबी गेंद इसलिए तारीख गई है, ताकि उसके दिन में, शाम को और रात में आसानी से देखा जा सके। सिर्फ जानकारी के लिए आपको बता दें कि लाल रंग की बॉल को डाई किया जाता है, जबकि सफेद और गुलाबी रंग की बॉल पर पेंट किया जाता है और उसकी एक खास तरह के कैमिकल (लाख या लाख) से कोटिंग की जाती है, ताकि रंग लंबे समय तक बना रहा।

सफेद गेंद से भी काम चल रहा था, तो गुलाबी की क्या ज़रूरत थी?

एक सवाल ये भी है कि जब सफेद गेंद से भी रात में और दिन में खेला जाता था तो गुलाबी की क्या जरूरत थी? दरअसल, टेस्ट मैच में खिलाड़ियों को 80 ओवर के बाद क्रिकेट की दूसरी गेंद मिलती है। यानी 80 ओवर तक एक ही बॉल से खेलना होता है। सफेद गेंद इतनी अधिक ओवर तक बहुत अधिक खराब हो जाती है। बता दें कि 50 ओवर के वन डे मैच में दो गेंदों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे पिच के दोनों हिस्सों से 25-25 ओवर खेले जाते हैं। बॉल बनाने वाली कंपनी कूजलुर्रा ने इसे बनाने में काफी मेहनत की है, ताकि सफेद बॉल की तरह ये जल्दी खराब ना हो और इससे देर तक खेला जा सके।

दानव को होने वाली समस्या

अगल फुल पिकलर गेंद फेंकी जाती है तो आरपीजी को उसे समझने में कठिनाई होती है। साथ ही, ये भी समझने में कठिनाई होती है कि बॉल कैसे और कितनी तेज स्पिन कर रही है। दरअसल, लाल गेंद में सफेद सिलाई होती है, जो गेंद की स्पिन को दिखाती है, लेकिन गुलाबी गेंद की सफेद सिलाई लाल गेंद के रूप में उभरती हुई दिखती है। साथ ही सूरज ढकना के समय का खेल गुलाबी गेंद से खेलने में कठिनाई होती है, जिसका जिक्र चेतेश्वर पुजारा भी कर रहे हैं।

गेंदबाजों को भी होती है दिक्कत

एक बात तो ये है कि लाल गेंद के मुकाबले गुलाबी गेंद जल्दी पुरानी हो जाती है। ये शुरू-शुरू में तो बेच शाइन करती है और स्विंग करती है, लेकिन जल्द ही अपनी शाइन हार जाती है और फिर सामान्य सी हो जाती है। ऐसी स्थिति में गुलाबी गेंद को रोकने वाले लोग पीटते हैं।

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